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قال تعالى ( يا أيها الذين أمنوا اذكروا الله كثيراً وسبحوه بكرة وأصيلا)أ
عن أنس بن مالك عن النبي صلى الله عليه وسلم قال(من قال صبيحة يوم الجمعة قبل صلاة الغداة , أستغفر الله الذي لا إله إلا هو الحي القيوم وأتوب إليه ثلاث مرات غفرالله ذنوبه ولو كانت مثل زبد البحر)
عن أبي بردة بن أبي موسى الأشعري، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم؛ أنه كان يدعو بهذا الدعاء "اللهم! اغفر لي خطيئتي وجهلي. وإسرافي في أمري. وما أنت أعلم به مني. اللهم! اغفر لي جدي وهزلي. وخطئي وعمدي. وكل ذلك عندي. اللهم! اغفر لي ما قدمت وما أخرت. وما أسررت وما أعلنت. وما أنت أعلم به مني. أنت المقدم وأنت المؤخر. وأنت على كل شيء قدير". رواه مسلم في صحيحه برقم (2719)
عن عقبة بن عامر رضى الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم (ما أحد يتوضأ فيحسن الوضوء ويصلي ركعتين يقبل بقلبه ووجهه عليهما إلا وجبت له الجنة)رواه مسلم وأبو داود وابن ماجة وابن خزيمة في صحيحة
عن أبي هريرة رضى الله عنه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول "اللهم! أصلح لي ديني الذي هو عصمة أمري. وأصلح لي دنياي التي فيها معاشي. وأصلح لي آخرتي التي فيها معادي. واجعل الحياة زيادة لي في كل خير. واجعل الموت راحة لي من كل شر". رواه مسلم في صحيحه برقم (2720)
عن أبي الأحوص، عن عبدالله رضى الله عنه، عن النبي صلى الله عليه وسلم؛ أنه كان يقول "اللهم! إني أسألك الهدى والتقى، والعفاف والغنى". رواه مسلم في صحيحه برقم(2721)
عن زيد بن أرقم رضى الله عنه. قال: لا أقول لكم إلا كما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: كان يقول "اللهم! إني أعوذ بك من العجز والكسل، والجبن والبخل، والهرم وعذاب القبر. اللهم! آت نفسي تقواها. وزكها أنت خير من زكاها. أنت وليها ومولاها. اللهم! إني أعوذ بك من علم لا ينفع، ومن قلب لا يخشع، ومن نفس لا تشبع، ومن دعوة لا يستجاب لها". رواه مسلم في صحيحه برقم(2722)
عن عبدالله رضى الله عنه قال: كان نبي الله صلى الله عليه وسلم إذا أمسى قال "أمسينا وأمسى الملك لله. والحمد لله. لا إله إلا الله وحده لا شريك له". قال: أراه قال فيهن "له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير. رب! أسألك خير ما في هذه الليلة وخير ما بعدها. وأعوذ بك من شر ما في هذه الليلة وشر ما بعدها. رب! أعوذ بك من الكسل وسوء الكبر. رب! أعوذ بك من عذاب في النار وعذاب في القبر". وإذا أصبح قال ذلك أيضا "أصبحنا وأصبح الملك لله". رواه مسلم في صحيحه برقم(2723)
عن عبدالرحمن بن يزيد، عن عبدالله رضى الله عنه . قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أمسى قال "أمسينا وأمسى الملك لله. والحمد لله. لا إله إلا الله وحده. لا شريك له. اللهم! إني أسألك من خير هذه الليلة وخير ما فيها. وأعوذ بك من شرها وشر ما فيها. اللهم! إني أعوذ بك من الكسل والهرم وسوء الكبر. وفتنة الدنيا وعذاب القبر". رواه مسلم في صحيحه برقم(2723)
عن أبي موسى رضى الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال (مثل الذي يذكر ربه والذي لا يذكره مثل الحي والميت) رواه البخاري.
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم(سبعة يظلهم الله في ظله يوم لا ظل إلا ظله: إمام عادل وشاب نشأ في عبادة الله, ورجل قلبه معلق بالمساجد إذا خرج منه حتى يعود إليه, ورجلان تحابا في الله اجتمعا عليه وتفرقا عليه, ورجل تصدق بصدقة فأخفاها حتى لا تعلم شماله ما تنفق يمينه, ورجل دعته امرأة ذات منصب وجمال فقال إني أخاف الله , ورجل ذكر الله خالياً ففاضت عيناه) متفق عليه
عن أبى هريرة رضى الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال ( كلمتان خفيفتان على اللسان ثقيلتان في الميزان حبيبتان إلى الرحمن سبحان الله وبحمده سبحان الله العظيم ) روه الشيخان والترمذي.
عن أبي مالك الحارث بن عاصم الأشعري رضى الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم(الطهور شطر الإيمان والحمدلله تملأ الميزان وسبحان الله والحمدلله تملأ أو تملآن ما بين السماء والأرض والصلاة نور والصدقة برهان والصبر ضياء والقرآن حجة لك أو عليك كل الناس يغدو فبائع نفسه أو موبقها) رواه مسلم. وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم(من قال سبحان الله وبحمده في يومه مائة مرة حُطت خطاياه ولو كانت مثل زبد البحر)رواه البخاري ومسلم.
عن أبي سعيد رضى الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال ( استكثروا من الباقيات الصالحات ) قيل وما هن يارسول الله؟ قال ( التكبير والتهليل والتسبيح والحمدلله ولا حول ولاقوة إلابالله ) رواه النسائي والحاكم وقال صحيح الاسناد.
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ( أحب الكلام إلى الله أربع- لا يضرك بأيهن بدأت: سبحان الله والحمدلله ولا إله إلا الله والله أكبر ). رواه مسلم

سماحة الإسلام بالأقلية غير المسلمة অমুসলিম সংখ্যালঘুদের প্রতি ইসলামের উদারতা

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سماحة الإسلام بالأقلية غير المسلمة অমুসলিম সংখ্যালঘুদের প্রতি ইসলামের উদারতা

مُساهمة من طرف alsaidilawyer في الثلاثاء 6 أغسطس 2013 - 19:06

অমুসলিম সংখ্যালঘুদের প্রতি ইসলামের উদারতা

[ বাংলা – Bengali – بنغالي ]
আলী হাসান তৈয়ব
সম্পাদনা : ড. আবু বকর মুহাম্মাদ যাকারি
2012 - 1434
سماحة الإسلام بالأقلية غير المسلمة
« باللغة البنغالية
علي حسن طيب
مراجعة: د/ أبو بكر محمد زكريا
2012 - 1434
অমুসলিম সংখ্যালঘুদের প্রতি ইসলামের উদারতা
একটি মুসলিম দেশে ইসলাম মুসলিমকে শুধু অমুসলিমদের সঙ্গে শান্তিতে বসবাস করতেই বলে না, রাষ্ট্রে তাদের সার্বিক নিরাপত্তা এবং সুখ-সমৃদ্ধিও নিশ্চিত করে। পবিত্র কুরআন ও সুন্নাহয় একাধিক স্থানে অমুসলিম সংখ্যালঘুদের অধিকার তুলে ধরা হয়েছে। অমুসলিমরা নিজ নিজ উপাসনালয়ে উপাসনা করবেন। নিজ ধর্মবিশ্বাস ও ধর্মালয়কে সুরক্ষিত রাখবেন। রাষ্ট্রের নাগরিক হিসেবে তারা সমান। তাদের প্রতি কোনো প্রকার বৈষম্য ইসলাম বরদাশত করে না। যেসব অমুসলিমের সঙ্গে কোনো সংঘাত নেই, যারা শান্তিপূর্ণভাবে মুসলিমদের সঙ্গে বসবাস করেন তাদের প্রতি বৈষম্য দেখানো নয়; ইনসাফ করতে বলা হয়েছে। আল্লাহ তা‘আলা ইরশাদ করেন,
﴿ لَّا يَنۡهَىٰكُمُ ٱللَّهُ عَنِ ٱلَّذِينَ لَمۡ يُقَٰتِلُوكُمۡ فِي ٱلدِّينِ وَلَمۡ يُخۡرِجُوكُم مِّن دِيَٰرِكُمۡ أَن تَبَرُّوهُمۡ وَتُقۡسِطُوٓاْ إِلَيۡهِمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُقۡسِطِينَ ٨ ﴾ [الممتحنة: ٨] 
‘আল্লাহ নিষেধ করেন না ওই লোকদের সঙ্গে সদাচার ও ইনসাফপূর্ণ ব্যবহার করতে যারা তোমাদের সঙ্গে ধর্মকেন্দ্রিক যুদ্ধ করে নি এবং তোমাদের আবাসভূমি হতে তোমাদের বের করে দেয় নি। নিশ্চয় আল্লাহ ইনসাফকারীদের পছন্দ করেন। {সূরা আল-মুমতাহিনা, আয়াত : ৮}
আল্লাহ তা‘আলা ঈমানের দাবিদার প্রতিটি মুসলিমকে নির্দেশ দিয়েছেন পরমতসহিঞ্চুতা ও পরধর্মের বা মতাদর্শের প্রতি শ্রদ্ধা দেখাতে। আল্লাহ ইরশাদ করেন,
﴿ وَلَا تَسُبُّواْ ٱلَّذِينَ يَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ فَيَسُبُّواْ ٱللَّهَ عَدۡوَۢا بِغَيۡرِ عِلۡمٖۗ كَذَٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمۡ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِم مَّرۡجِعُهُمۡ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ١٠٨ ﴾ [الانعام: ١٠٨] 
‘তারা আল্লাহ তা‘আলার বদলে যাদের ডাকে, তাদের তোমরা কখনো গালি দিয়ো না, নইলে তারাও শত্রুতার কারণে না জেনে আল্লাহ তা‘আলাকেও গালি দেবে, আমি প্রত্যেক জাতির কাছেই তাদের কার্যকলাপ সুশোভনীয় করে রেখেছি, অতঃপর সবাইকে একদিন তার মালিকের কাছে ফিরে যেতে হবে, তারপর তিনি তাদের বলে দেবেন, তারা দুনিয়ার জীবনে কে কী কাজ করে এসেছে’। {সূরা আল আন‘আম, আয়াত : ১০৮}
কোনো বিধর্মী উপসনালয়ে সাধারণ অবস্থা তো দূরের কথা যুদ্ধাবস্থায়ও  হামলা করা যাবে না। কোনো পুরোহিত বা পাদ্রীর প্রতি অস্ত্র তাক করা যাবে না। কোনো উপসনালয় জ্বালিয়ে দেয়া যাবে না। হাবীব ইবন অলীদ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সৈন্যদল প্রেরণকালে বলতেন,
«انْطَلِقُوا بِسْمِ اللَّهِ وَبِاللَّهِ، وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ، تُقَاتِلُونَ مَنْ كَفَرَ بِاللَّهِ، أَبْعَثُكُمْ عَلَى أَنْ لَا تَغُلُّوا، وَلَا تَجْبُنُوا، وَلَا تُمَثِّلوا، وَلَا تَقْتُلُوا وَلِيدًا، وَلَا تَحْرِقُوا كَنِيسَةً، وَلَا تَعْقِرُوا نَخْلًا»
‘তোমরা আল্লাহ ও আল্লাহর নামে আল্লাহর পথে যাত্রা কর। তোমরা আল্লাহর প্রতি কুফরকারীদের বিরুদ্ধে লড়াই করবে। আমি তোমাদের কয়েকটি উপদেশ দিয়ে প্রেরণ করছি : (যুদ্ধক্ষেত্রে) তোমরা বাড়াবাড়ি করবে না, ভীরুতা দেখাবে না, (শত্রুপক্ষের) কারো চেহারা বিকৃতি ঘটাবে না, কোনো শিশুকে হত্যা করবে না, কোনো গির্জা জ্বালিয়ে দেবে না এবং কোনো বৃক্ষও উৎপাটন করবে না।’ [আবদুর রাযযাক, মুসান্নাফ : ৯৪৩০]
এদিকে মুওতার যুদ্ধে রওনার প্রাক্কালে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর বাহিনীকে নির্দেশ দেন :
« وَلاَ تَقْتُلُوا امْرَأَةً وَلاَ صَغِيرًا ضَرَعًا وَلاَ كَبِيرًا فَانِيًا وَلاَ تَقْطَعُنَّ شَجَرَةً وَلاَ تَعْقِرُنَّ نَخْلاً وَلاَ تَهْدِمُوا بَيْتًا ».
‘তোমরা কোনো নারীকে হত্যা করবে না, অসহায় কোনো শিশুকেও না; আর না অক্ষম বৃদ্ধকে। আর কোনো গাছ উপড়াবে না, কোনো খেজুর গাছ জ্বালিয়ে দেবে না। আর কোনো গৃহও ধ্বংস করবে না।’ [মুসলিম : ১৭৩১]
আরেক হাদীসে আছে, আবদুল্লাহ ইবন আব্বাস রাদিআল্লাহু আনহু থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, 
« كَانَ إذَا بَعَثَ جُيُوشَهُ ، قَالَ : لاَ تَقْتُلُوا أَصْحَابَ الصَّوَامِعِ ».
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিজের কোনো বাহিনী প্রেরণ করলে বলতেন, ‘তোমরা গির্জার অধিবাসীদের হত্যা করবে না।’ [ইবন আবী শাইবা, মুসান্নাফ : ৩৩৮০৪; কিতাবুল জিহাদ, যুদ্ধক্ষেত্রে যাদের হত্যা করা নিষেধ অধ্যায়]
আবূ বকর রাদিআল্লাহু আনহুও একই পথে হাঁটেন। আপন খিলাফতকালে প্রথম যুদ্ধের বাহিনী প্রেরণ করতে গিয়ে তিনি এর সেনাপতি উসামা ইবন যায়েদ রাদিআল্লাহু আনহুর উদ্দেশে বলেন,
يا أيها الناس، فقوا أوصيكم بعشر فاحفظوها عني: لا تخونوا ولا تغلوا ولا تغدروا، ولا تمثلوا ولا تقتلوا طفلاً صغيراً، ولا شيخاً كبيراً ولا امرأة، ولا تعزقوا نخلاً ولا تحرقوه، ولا تقطعوا شجرة مثمرة، ولا تذبحو شاة ولا بقرة، ولا بعيراً إلا لمآكله. وسوف تمرون بأقوام قد فرغوا أنفسهم في الصوامع فدعوهم وما فرغوا أنفسهم له.
‘হে লোক সকল, দাঁড়াও আমি তোমাদের দশটি বিষয়ে উপদেশ দেব। আমার পক্ষ হিসেবে কথাগুলো তোমরা মনে রাখবে। কোনো খেয়ানত করবে না, বাড়াবাড়ি করবে না, বিশ্বাসঘাতকতা করবে না, (শত্রুদের) অনুরূপ করবে না, ছোট বাচ্চাকে হত্যা করবে না, বয়োবৃদ্ধকেও না আর নারীকেও না। খেজুর গাছ কাটবে না কিংবা তা জ্বালিয়েও দেবে না। কোনো ফলবতী গাছ কাটবে না। আহারের প্রয়োজন ছাড়া কোনো ছাগল, গরু বা উট জবাই করবে না। আর তোমরা এমন কিছু লোকের সামনে দিয়ে অতিক্রম করবে যারা গির্জাগুলোয় নিজেদের ছেড়ে দিয়েছে। তোমরাও তাদেরকে তাদের এবং তারা যা ছেড়ে নিজেদের জন্য তাতে ছেড়ে দেবে। [মুখতাসারু তারীখি দিমাশক : ১/৫২; তারীখুত তাবারী]
কোনো মুসলিম যদি কোনো অমুসলিমের প্রতি অন্যায় করেন, তবে রোজ কিয়ামতে খোদ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার বিপক্ষে লড়বেন বলে হাদীসে এসেছে। একাধিক সাহাবী থেকে বর্ণিত হয়েছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন,
«أَلَا مَنْ ظَلَمَ مُعَاهِدًا، أَوِ انْتَقَصَهُ، أَوْ كَلَّفَهُ فَوْقَ طَاقَتِهِ، أَوْ أَخَذَ مِنْهُ شَيْئًا بِغَيْرِ طِيبِ نَفْسٍ، فَأَنَا حَجِيجُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ»
‘সাবধান! যদি কোনো মুসলিম কোনো অমুসলিম নাগরিকের ওপর নিপীড়ন চালিয়ে তার অধিকার খর্ব করে, তার ক্ষমতার বাইরে কষ্ট দেয় এবং তার কোনো বস্তু জোরপূর্বক নিয়ে যায়, তাহলে কিয়ামতের দিন আমি তার পক্ষে আল্লাহর দরবারে অভিযোগ উত্থাপন  করব।’ [আবূ দাঊদ : ৩০৫২]
অপর এক হাদীসে বর্ণিত হয়েছে, আবদুল্লাহ ইবন উমর রাদিয়াল্লাহু ‘আনহুমা থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন,  
«مَنْ قَتَلَ مُعَاهَدًا لَمْ يَرِحْ رَائِحَةَ الجَنَّةِ، وَإِنَّ رِيحَهَا تُوجَدُ مِنْ مَسِيرَةِ أَرْبَعِينَ عَامًا»
‘যে মুসলিম কর্তৃক নিরাপত্তা প্রাপ্ত কোনো অমুসলিমকে হত্যা করবে, সে জান্নাতের ঘ্রাণও পাবে না। অথচ তার ঘ্রাণ পাওয়া যায় চল্লিশ বছরের পথের দূরত্ব থেকে’। [বুখারী : ৩১৬৬]
আরেক হাদীসে বর্ণিত হয়েছে, আবী বাকরা রাদিয়াল্লাহু ‘আনহু থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন,
«مَنْ قَتَلَ مُعَاهِدًا فِي غَيْرِ كُنْهِهِ حَرَّمَ اللَّهُ عَلَيْهِ الْجَنَّةَ»
‘যে ব্যক্তি চুক্তিতে থাকা কোনো অমুসলিমকে অসময়ে (অন্যায়ভাবে) হত্যা করবে আল্লাহ তার জন্য জান্নাত হারাম করে দেবেন’। [আবূ দাঊদ : ২৭৬০; নাসাঈ : ৪৭৪৭, আলবানী হাদীসটিকে সহীহ বলেছেন।]
ঐতিহাসিক বিদায় হজের দীর্ঘ ভাষণে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সমাজ ও রাষ্ট্রের সব দিক ও বিভাগ সম্পর্কে দিক-নির্দেশনা দিয়েছেন। তিনি মাতাপিতার হক, সন্তান-সন্ততির হক, আত্মীয়-স্বজনদের হক, অনাথ ও দরিদ্রদের হক, প্রতিবেশীর হক, মুসাফিরের হক, চলার পথের সঙ্গী বা পথচারীর হক, দাস-দাসী বা চাকর-চাকরানীর  হক এমনকি ইসলামী রাষ্ট্রে অমুসলিমের হক সম্পর্কেও নির্দেশনা দিয়েছেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সংখ্যাগরিষ্ঠ মুসলিম সমাজে মুসলিমদের কাছে অমুসলিমদেরকে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের পক্ষ থেকে আমানত হিসেবে আখ্যায়িত করেছেন। মুসলিমদের তিনি অমুসলিমদের নিরাপত্তা দানের নির্দেশ দিয়েছেন।
সংখ্যাগরিষ্ঠ মুসলিম জনগোষ্ঠীকে প্রয়োজনে অমুসলিমদের জান-মালের নিরাপত্তার দায়িত্ব পালন করতে হবে। তাদের ইজ্জত-আব্রু ও ধর্মীয় প্রতিষ্ঠানগুলোর নিরাপত্তার জন্য প্রহরীর দায়িত্ব পালন করতে হবে। কারণ অমুসলিম জনগোষ্ঠী তারাও মানুষ, তারাও আল্লাহর বান্দা। ইসলাম সম্পর্কে তারা ভুল বা বিভ্রান্তির শিকার হলে তাদের প্রতি আক্রমণ না করে তাদেরকে মূল সত্য এবং ইসলামের মহানুভবতা সম্পর্কে অবহিত করতে হবে। 
ইসলামের দৃষ্টিকোণে দুনিয়ায় মানুষের প্রাণ হরণ কিংবা জীবন নাশের চেয়ে বড় অপরাধ আর হয় না। পবিত্র কুরআনে তাই একজন মানুষের হত্যাকে পুরো মানবজাতির হত্যা বলে আখ্যায়িত করা হয়েছে। আল্লাহ তা‘আলা ইরশাদ করেন,
﴿ مَن قَتَلَ نَفۡسَۢا بِغَيۡرِ نَفۡسٍ أَوۡ فَسَادٖ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ ٱلنَّاسَ جَمِيعٗا وَمَنۡ أَحۡيَاهَا فَكَأَنَّمَآ أَحۡيَا ٱلنَّاسَ جَمِيعٗاۚ ﴾ [المائ‍دة: ٣٢]  
‘যে ব্যক্তি কাউকে হত্যা করা কিংবা যমীনে ফাসাদ সৃষ্টি করা ছাড়া যে কাউকে হত্যা করল, সে যেন সব মানুষকে হত্যা করল। আর যে তাকে বাঁচাল, সে যেন সব মানুষকে বাঁচাল’। {সূরা আল-মায়িদা, আয়াত : ৩২}
মানুষের প্রাণহানী ঘটানোকে যেখানে বলা হয়েছে পুরো মানব জাতিকে হত্যার সমতুল্য, সেখানে বিশৃঙ্খলা সৃষ্টিকে গণ্য করা হয়েছে হত্যার চেয়েও জঘন্য অপরাধ হিসেবে। আল্লাহ তা‘আলা ইরশাদ করেন,
﴿ وَٱلۡفِتۡنَةُ أَشَدُّ مِنَ ٱلۡقَتۡلِۚ ﴾ [البقرة: ١٩١] 
‘আর ফিতনা হত্যার চেয়ে কঠিনতর’। {সূরা আল-বাকারা, আয়াত : ১৯১}
অতএব বাংলাদেশের রামুতে একটি অন্যায়কে কেন্দ্র করে যা করা হয়েছে, তাও ন্যায়সঙ্গত হয়নি। একজনের অপরাধে দশজনকে শাস্তি প্রদান কোনো মুসলিমের কাছে সমর্থনযোগ্য নয়। বিভিন্ন সময় দেশের কিছু কিছু অঞ্চলে পূজোমণ্ডপে অনাকাঙ্ক্ষিত হামলা হয়। প্রতিমা ভাংচুর করে দুষ্কৃতকারীরা। এসব কখনো ভালো ফল বয়ে আনে না। শান্তি ও সৌহার্দ্যের পরিবেশ নষ্ট করে। পৃথিবীর কাছে একটি মুসলিম সংখ্যাগুরু দেশ হিসেবে বাংলাদেশকে ছোট করে। ইসলাম সম্পর্কে অমুসলিমরা ভুল বার্তা পান।
জানা যায়, গত ২৯ সেপ্টেম্বর ২০১২ ইং রাতে কক্সবাজারের রামু উপজেলায় দুষ্কৃতকারীদের একাধিক দল বৌদ্ধ ধর্মাবলম্বীদের ১২টি বৌদ্ধবিহার ও মন্দিরে অগ্নিসংযোগ করে। পুড়িয়ে দেয় বৌদ্ধ পল্লীর ৪০টির মতো বসতবাড়ি। ভাংচুর চালায় আরও কিছু বাড়িঘরে। টেকনাফ, উখিয়া, পটিয়াতেও এমন সহিংসতা ছড়িয়ে পড়ে।
গণমাধ্যম সূত্রে জানা যায়, শনিবার রাত ১০টার কাছাকাছি সময় থেকে বৌদ্ধ মন্দির, স্থানীয় ভাষায় যাকে কিয়াং বলা হয়, তার ওপর আক্রমণ হয়েছে। কিছু হিন্দু মন্দিরও এ আক্রমণের আওতায় পড়েছে এবং একই সঙ্গে আগুন লাগানো ও লুটতরাজের মতো ঘটনাও ঘটেছে। টেকনাফের হোয়াইক্যং নামের একটি জায়গায় পুলিশের গুলি চালাতে হয়েছে এবং উখিয়ায় দু’জন পুলিশসহ ১২ জন আহত হন। এসব স্থানে কর্তৃপক্ষকে ১৪৪ ধারা জারি করতে হয়েছে।
ঘটনার পর থেকেই দেশজুড়ে প্রতিবাদের ঝড় উঠেছে। সব রাজনৈতিক দল ও গোষ্ঠী এর নিন্দা জানিয়েছে। দেশের শীর্ষ উলামায়ে কিরাম এবং ধর্মপ্রাণ মুসলিমরাও এ কাজের নিন্দা জানিয়েছেন। আমরাও মনে করি এ ঘটনা চরম নিন্দনীয়। ইসলামের আদর্শই হচ্ছে সম্প্রদায়ে-সম্প্রদায়ে সম্প্রীতি। এ সম্প্রীতি ধ্বংসের কোনো উস্কানি আর অন্যায় প্রতিক্রিয়া সবই শাস্তিযোগ্য।
আমাদের মনে রাখতে হবে, ইসলামের শান্তিপূর্ণ ও উদারনৈতিক শিক্ষার সৌজন্যেই সংখ্যাগরিষ্ঠ মুসলিম অধ্যুষিত বাংলাদেশ সাম্প্রদায়িক সম্প্রীতি ও পরমতসহিষ্ণুতার জন্য বরাবর সারা বিশ্বের সুনাম কুড়িয়েছে। এ দেশের মুসলিম সবসময় তাদের ধর্মের শিক্ষা অনুযায়ী অন্য ধর্মের লোকদের সঙ্গে শান্তি ও সৌহার্দ্যপূর্ণ সম্পর্ক বজায় রেখেছে। এ দেশে মসজিদ-মন্দিরে পাশাপাশি স্ব-স্ব ধর্মের ইবাদত হয়। পবিত্র মাহে রমজানে হিন্দুরা সাড়ম্বরে অষ্টমী পালন করে। খ্রিস্টানরা জাঁকজমকভাবে বড়দিন উদযাপন করেন। বৌদ্ধ ও অন্য ধর্মাবলম্বীরাও নিজ নিজ ধর্মীয় উত্সব নির্বিবাদে পালন করেন।
পক্ষান্তরে আমাদের নিকট প্রতিবেশী ভারতে ক’দিন পরপরই সংখ্যাগরিষ্ঠ হিন্দু কর্তৃক মুসলিমরা আক্রান্ত হন, আরেক প্রতিবেশী মিয়ানমারে এই সেদিনও রাষ্ট্রের প্রত্যক্ষ ইন্ধনে সাধারণ বৌদ্ধ থেকে নিয়ে শান্তিপ্রিয় হিসেবে খ্যাত ভিক্ষুরা পর্যন্ত নির্বিচার হামলা ও হত্যাযজ্ঞ চালাল মুসলিমের বিরুদ্ধে। গ্রামের পর গ্রাম জ্বালিয়ে দেয়া হয়েছে। নারী-শিশু-বৃদ্ধকে অকাতরে হত্যা করা হয়েছে। এ দেশের কোটি মুসলিমের হৃদয় কেঁদেছে তখন, তবে কেউ এ দেশের সংখ্যালঘু হিন্দু বা বৌদ্ধদের ওপর সে ক্ষোভ দেখান নি।
আমেরিকায় মহানবীকে সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম অবমাননা করে চলচ্চিত্র নির্মাণের ঘটনায় যখন সারা বিশ্ব উত্তাল, বিশ্বের দুইশ’ কোটি মুসলিমের হৃদয়ে যখন জ্বলছে ক্ষোভের দাবানল, তখন একের পর এক ফ্রান্সের সাপ্তাহিকে, তারপর স্পেনের একটি ম্যাগাজিনে মহানবীর ব্যঙ্গ কার্টুন প্রকাশের ঘটনা বিশ্ব মুসলিমকে ব্যথিত ও ক্ষুব্ধ করেছে। বাকস্বাধীনতার নামে অন্যের পবিত্র ধর্মানুভূতিতে আঘাত কোনো ধর্মই অনুমোদন করে না। তারপরও ঘটছে এমন ঘটনা। স্বল্প বিরতিতে ক’দিন পরপরই ঘটছে এর পুনরাবৃত্তি। এমন প্রেক্ষাপটে বাংলাদেশের প্রত্যন্ত অঞ্চল রামুতে শান্তিপ্রিয় বৌদ্ধ সম্প্রদায়ের উত্তম বড়ুয়া নামের এক অখ্যাত কুলাঙ্গার এমন এক ঘটনা ঘটিয়েছে যা এ অঞ্চলের সর্বশ্রেণীর মানুষকে ক্ষুব্ধ করে তুলেছে।
উত্তম বড়ুয়ার বর্বর ঘটনার পর নিন্দা ও প্রতিবাদের বিষয়টি স্বাভাবিক, সমর্থনযোগ্য এবং করণীয়ও বটে। কিন্তু আইন হাতে তুলে নিয়ে নির্বিচারে সহিংসতা অন্যায়। একজনের অপরাধে দশজনকে শাস্তি দেওয়া অনুমোদিত নয়। আল্লাহ তা‘আলা ইরশাদ করেন,
﴿ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُونُواْ قَوَّٰمِينَ لِلَّهِ شُهَدَآءَ بِٱلۡقِسۡطِۖ وَلَا يَجۡرِمَنَّكُمۡ شَنَ‍َٔانُ قَوۡمٍ عَلَىٰٓ أَلَّا تَعۡدِلُواْۚ ٱعۡدِلُواْ هُوَ أَقۡرَبُ لِلتَّقۡوَىٰۖ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَۚ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرُۢ بِمَا تَعۡمَلُونَ ٨ ﴾ [المائ‍دة: ٨] 
‘হে মুমিনগণ, তোমরা আল্লাহর জন্য ন্যায়ের সাথে সাক্ষদানকারী হিসেবে সদা দণ্ডায়মান হও। কোনো কওমের প্রতি শত্রুতা যেন তোমাদেরকে কোনোভাবে প্ররোচিত না করে যে, তোমরা ইনসাফ করবে না। তোমরা ইনসাফ কর, তা তাকওয়ার নিকটতর। এবং আল্লাহকে ভয় কর। নিশ্চয় তোমরা যা কর, আল্লাহ সে বিষয়ে সবিশেষ অবহিত’। {সূরা আল-মায়িদা, আয়াত : ৮}
এমন ঘটনার পর সর্বপ্রথম দায়িত্ব হলো ঘটনার শান্তিপূর্ণ প্রতিবাদ জানানো এবং ওই ব্যক্তিকে আইনের কাছে সোপর্দ করা। এ ধরনের অপরাধের ভয়াবহতা, পবিত্র কুরআনের মাহাত্ম্য, মহানবীর মহানুভবতা এবং ইসলামের উদারতা সম্পর্কে মানুষকে সচেতন ও ওয়াকিফ করা।
কিন্তু দুঃখজনক সত্য হলো, উত্তম কুমার বড়ুয়া অনুত্তম কাজ করলেও রাষ্ট্র্র ও আন্তর্জাতিক সাহায্যপুষ্ট এনজিও, বুদ্ধিজীবী ও মিডিয়া এ কাজের যথাযথ নিন্দা জানায় নি। তাকে আইনের হাতে সোপর্দ করার কথা বলে নি। আরও দুঃখজনক ব্যাপার হলো, উত্তমের বর্বর কাণ্ডের পর যে সহিংস প্রতিক্রিয়া প্রকাশিত হয়েছে, তা থেকেও রাজনৈতিক দলগুলো নিজেদের রাজনৈতিক ফায়দা হাসিলের চেষ্টা করে গেছে। আর সব রাজনৈতিক ইস্যুর মতো এ নিয়েও পরস্পরকে দোষারোপের চর্চা চলেছে। ইসলামকে রাজনীতির বলি বানানো হয়েছে!
পশ্চিমা বিশ্ব যেমন যে কোনো দুর্ঘটনার পেছনে জঙ্গিবাদ খুঁজে বেড়ায়, ক্ষমতাসীনরা রাজনৈতিক ফায়দা লুটতে চান, সন্ত্রাসের মূল কারণ উদ্ঘাটন ও উত্পাটন না করে ছায়া শত্রুর পেছনে লেগে থেকে শত্রু বৃদ্ধি করেন। আমরাও কেন যেন এমন ঘটনার পেছনে না গিয়ে ছায়া শত্রুদের গালাগাল করছি। বাংলাদেশে সর্বশেষ এক বছরে মানিকগঞ্জে, তারপর মৌলভীবাজারে এবং সর্বশেষ রামুতে মুসলিমের ধর্মীয় অনুভূতিতে আঘাতের ঘটনা ঘটল। ঘটনাগুলোর যথাযথ প্রতিকার, অপরাধীদের শাস্তির আওতায় আনা হলে হয়তো পরবর্তী ঘটনার অবতারণা হতো না।
সরকারকে ইসলাম অবমাননার উস্কানি সৃষ্টির পথ বন্ধ করতে হবে। এ ধরনের অপরাধীকে তাত্ক্ষণিক শাস্তির আওতায় আনতে হবে। তাহলে অনিয়ন্ত্রিত ক্ষুব্ধতা কিংবা আবেগের ভুল প্রয়োগের পথও বন্ধ হবে। বিশেষত এ ধরনের ঘটনা থেকে দেশি-বিদেশি যে ষড়যন্ত্রকারী মহল ফায়দা লুটতে চায়, তাদেরও গতি রোধ করা সম্ভব হবে। সর্বোপরি, ধর্মীয় সংখ্যালঘুদের প্রতি সদাচার ও সাম্প্রদায়িক সৌহার্দ্য-সম্প্রীতির বন্ধনকে অটুট রাখতে সবাইকে সজাগ ও সচেতন থাকতে হবে। আল্লাহ সকল মুসলিম ইসলামের উদারতা ও মহানুভতা সবার সামনে তুলে ধরার তাওফীক দান করুন। আমীন।


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d.ahmed
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رد: سماحة الإسلام بالأقلية غير المسلمة অমুসলিম সংখ্যালঘুদের প্রতি ইসলামের উদারতা

مُساهمة من طرف d.ahmed في الأربعاء 28 مارس 2018 - 11:15



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